बुधवार, 2 जुलाई 2014

उन्हें देखना हमें पसंद है 
लेकिन हम तो उन्हें पसंद ही नहीं ।।
''अपनी इज्ज़त अपने हाथ'', ऐसी एक ही गलती क्यूँ बार बार दोहरानी जिससे हमेशा अपनी इज्ज़त का तमाशा बनता रहे ।।
इंसान को 'कुछ पसंद' आने की कोई ना कोई 'ख़ास वजह' तो होती ही है नहीं तो ऐसे ही कुछ 'पसंद' नहीं आती किसी को ।। 
समझौता (compromise) अपने अपने परिवार या फिर रिश्ते को बिखरने से बचाने के लिए किया जाय, तो ठीक है । न की किसी की चापलूसी या नाज़ायज़ ज़िद्द को पूरा करने के लिए । चाहे वह कर्मक्षेत्र की किसी भी मैदान में क्यूँ न हो ।

सोमवार, 23 जून 2014

"जो हमारा नहीं है और जो हमारा कभी हो भी नहीं सकता ! हम इंसान कभी कभी उसके ऊपर बहुत आसानी से हक़ जमा लेते हैं, और फिर खोने के डर से पागलों जैसे हरकत करते है ।।"

शुक्रवार, 6 जून 2014

एकबार सोचिएगा हमारी सारी देशभक्ति मूलक नीतियाँ अगर व्यक्ति देख कर बदल जाती है तो इतना जान लीजिये फिर हम व्यक्तिवादी है न की राष्ट्रवादी ॥
हमारे मन में किसी व्यक्ति के लिए जो ओहदा, सम्मान और प्यार हैं हमेशा सामने वाले के मन में भी हमारे लिए वोही ओहदा, सम्मान और प्यार हो यह ज़रूरी नहीं है । हर एक इन्सान की संवेदनाएं, भावनाएं और अनुभव अलग अलग होती है इसीलिए एहसास भी अलग अलग होता है । फिर दुःख किस बात का हमें बस अपने हक़ का कार्य करना है और एकदिन इस दुनिया से चले जाना है ।।